राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में हिंदी में लिखी थीसिस भी होगी मान्य

भोपाल। मध्यप्रदेश के राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (आरजीपीवी) एक बड़ी पहल करने जा रहा है। दरअसल, अब इस विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा में लिखी गई थीसिस (शोध ग्रंथ) भी मान्य होगी। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में

शोध करने वाले शोधार्थी चाहें तो अब हिंदी में भी थीसिस लिख सकेंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से आरजीपीवी को पिछले दिनों एक पत्र मिला जिसमें यूजीसी ने शोधकार्य करने वाले विद्यार्थियों को हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इंजीनियरिंग में पीएचडी की थीसिस लिखने का अवसर देने को कहा गया है। ऐसे में विवि ने आगे आकर इसे अपनाया है।
हालांकि विश्वविद्यालय द्वारा उठाया जा रहा यह कदम चौंकाने वाला है।

हिंदी भाषी राज्यों में क्लास रूम टीचिंग में भले शिक्षक और छात्र ही हिंदी भाषा का उपयोग कर लेते हैं। लेकिन इसे पूरी तरह से अपनाने के लिए एक बड़ा वर्ग सहमत नहीं होगा। इसके पीछे लिखने के लिए हिंदी की शब्दावली होना सबसे जरूरी है। इसके अलावा मूल्यांकन करने के लिए प्रोफेसर्स की स्वीकारोक्ति भी अहम है।
पीएचडी के स्टैण्डर्ड को मेनटेन करने के लिए इसकी थीसिस अन्य राज्यों के विश्वविद्याल, आईआईटी, एनआईटी जैसे संस्थानों के प्रोफेसर्स के पास भेजी जाती है। ऐसे में वे हिंदी में मूल्यांकन करने के लिए तैयार होंगे या नहीं यह देखने लायक होगा।

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) ने क्षेत्रीय भाषाओं में अध्ययन-अध्यापन को बढ़ावा देने के लिए देशभर के विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर काम कर रहा है। वह हिंदी में भी पाठ्यसामग्री तैयार करने के लिए प्रयासरत है।

आरजीपीवी में अभी तक विश्वविद्यालय में सिर्फ अंग्रेजी में ही लिखी गई थीसिस ही स्वीकार की जाती थी। विश्ववविद्यालय के इस फैसले से प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हिंदी भाषा को मान्य किए जाने के कारण हिंदी भाषी शोध कर्ताओं को आसानी हो सकेगी।  हालांकि हिंदी भाषा में अभी तक प्रौद्योगिकी से जुड़े विषयों में किताबें, ग्रंथ कम ही उपलब्ध हैं। ऐसे में शुरुआत में चुनौती होगी। लेकिन जब पीएचडी करने वाले शोधकर्ता हिंदी में शोध ग्रंथ लिखने में रुचि लेंगे तो भविष्य में हिंदी में भी पाठ्य सामग्री उपलब्ध होने में आसानी हो सकेगी। 

आरजीवीपी के अकादमिक काउंसिल के सदस्य और कुलपति इसे सकारात्मक नजरिये से देख रहे हैं। कुलपति प्रो. सुनील कुमार कहते हैं कि हिंदी भाषी राज्य का विश्वविद्यालय होने के नाते उनका दायित्व है कि वे यहां के विद्यार्थियों को हिंदी भाषा का माध्यम उपलब्ध कराकर शोधकार्य करने का अवसर दें। भविष्य में चुनौती जरूर सामने आएंगी। लेकिन इनका सामना करने के लिए आगे तो आना ही होगा।


menu
menu